Monday, April 27, 2020

प्रकाश का प्रकीर्णन | आकाश का रंग नीला क्यों दिखाई देता है | why sky is blue in hindi

प्रकाश का प्रकीर्णन (आकाश का रंग नीला क्यों दिखाई देता है)


जब सूर्य का प्रकाश पृथ्वी के परिमंडल में गमन करता है तो यह वायुमंडल के कणों द्वारा प्रकीर्णित होता है। 
छोटी तरंग दैर्ध्य का प्रकाश बड़ी तरंगदैर्ध्य की तुलना में कहीं अधिक प्रकीर्ण होता है। (प्रकीर्णन की मात्रा तरंगदैर्घ्य की चतुर्थ घात के व्युत्क्रमानुपाती होती है। इसे रैले प्रकीर्णन कहते हैं।) यही कारण है कि स्वच्छ आकाश में नीला वर्ण सर्वाधिक प्रमुखता दर्शाता है, क्योंकि लाल वर्ण की अपेक्षा नीले वर्ण की तरंगदैर्घ्य कम होती है तथा इसका प्रकीर्णन अधिक प्रबलता से होता है।

वास्तव में बैंगनी वर्ण की तरंगदैर्घ्य और भी कम होने के कारण यह नीले वर्ण से भी अधिक प्रबलता से प्रकीर्णन होता है। लेकिन हमारी आँखें बैंगनी वर्ण की अपेक्षा नीले वर्ण के लिए अधिक सुग्राही हैं, इसलिए हमें आकाश नीला दिखाई देता है।
वायुमंडल में उपस्थित बड़े कण जैसे धूल तथा जल की सूक्ष्म बूँदें भिन्न व्यवहार दर्शाते हैं। यहाँ पर इस संदर्भ में प्रासंगिक राशि, प्रकाश की तरंगदैर्घ्य λ तथा प्रकीर्णक (मान लीजिए इनका प्रारूपी साइज़ a है) के आपेक्षिक साइज़ हैं। a<<λ के लिए, रैले प्रकीर्णन होता है जो कि (1/λ)^4 के अनुक्रमानुपाती होता है। a>>λ के लिए, अर्थात बड़े साइज़ की प्रकीर्णक वस्तु के लिए (उदाहरण के लिए वर्षा की बूंद, बड़े आकार के धूल कण अथवा हिम कण) ऐसा प्रकीर्णन नहीं होता; सभी तरंगदैर्घ्य लगभग समान रूप से प्रकीर्णित होती हैं। इसीलिए बादल जिनमें a>>λ

साइज की जल की सूक्ष्म बूंदें होती हैं, सामान्यतः श्वेत प्रतीत होते हैं।
सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सूर्य की किरणों को वायुमंडल से होकर अपेक्षाकृत अधिक दूरियां तय करनी पड़ती है । इस प्रकाश से नीला तथा छोटी तरंगदैर्घ्य का अधिकांश प्रकाश प्रकीर्णन द्वारा पृथक हो जाता है।

अत: प्रकाश का सबसे कम प्रकीर्णित भाग जो हमारी आँखों तक पहुँचता है, लाल प्रतीत होता है। यही कारण है कि क्षितिज के निकट होने पर सूर्य तथा पूर्ण चंद्रमा लाल प्रतीत होते हैं।


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